50 साल से मूर्तियां गढ़ रहे सचिंद्रनाथ, इस बार बिक्री ने तोड़ी उम्मीदें

अर्पित तिवारी,बलरामपुर,छत्तीसगढ़,14सितंबर2026

त्योहारों की रौनक बढ़ाने वाली खूबसूरत मूर्तियों के पीछे एक कलाकार की वर्षों की मेहनत, कला और उम्मीदें छिपी होती हैं। लेकिन इस बार यही उम्मीदें आर्थिक संकट में बदलती नजर आ रही हैं। सरगुजा संभाग के बलरामपुर निवासी मूर्तिकार सचिंद्रनाथ मंडल पिछले करीब पांच दशकों से मूर्तियां बनाने का काम कर रहे हैं। आज भी उनका परिवार इसी पारंपरिक कला के सहारे अपनी आजीविका चला रहा हैं।सचिंद्रनाथ मंडल ने वर्ष 1977 में अंबिकापुर के घड़ी चौक स्थित दुर्गाबाड़ी से मूर्ति निर्माण की शुरुआत की थी। उस समय उन्होंने महज 3 रुपये में मां काली और 70 रुपये में मां दुर्गा की प्रतिमा तैयार की थी। समय बदला, महंगाई बढ़ी और मूर्तियों की लागत भी बढ़ी, लेकिन उनकी मेहनत और कला के प्रति समर्पण आज भी कायम हैं।

🟠210 मूर्तियां बनाईं, अब तक सिर्फ 70 की बिक्री

इस गणेशोत्सव पर सचिंद्रनाथ मंडल ने छोटी-बड़ी करीब 210 गणेश प्रतिमाएं तैयार कीं। महीनों की मेहनत और खर्च के बाद उन्हें उम्मीद थी कि त्योहार के दौरान सभी मूर्तियां बिक जाएंगी, लेकिन अब तक महज 70 प्रतिमाओं की बिक्री हो सकी हैं। बड़ी संख्या में तैयार मूर्तियां अब भी खरीदारों का इंतजार कर रही हैं।सचिंद्रनाथ मंडल, मूर्तिकार के मुताबिक, मूर्ति निर्माण में मेहनत के साथ-साथ मिट्टी, रंग, सजावटी सामग्री और अन्य संसाधनों पर लगातार खर्च बढ़ रहा हैं। बिक्री उम्मीद के मुताबिक नहीं होने से परिवार के सामने आर्थिक परेशानी खड़ी हो रही हैं।

🟠दूसरे राज्यों से आने वाली मूर्तियां बनी चुनौती

स्थानीय मूर्तिकारों का कहना हैं,कि दूसरे राज्यों से ट्रकों में भरकर छोटी-बड़ी मूर्तियां बाजार में पहुंच रही हैं। बाहर से आने वाली इन मूर्तियों के कारण स्थानीय कलाकारों को कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा हैं। इसका सीधा असर उनकी बिक्री और आमदनी पर पड़ रहा हैं।करीब 50 वर्षों से पूरे परिवार के साथ मूर्ति निर्माण कर रहे सचिंद्रनाथ मंडल अब सरकार और प्रशासन से सहयोग व संरक्षण की उम्मीद लगाए बैठे हैं। उनका कहना हैं,कि स्थानीय कलाकारों को बाजार और सरकारी स्तर पर प्रोत्साहन मिले तो इस पारंपरिक कला को बचाने के साथ कई परिवारों की आजीविका भी सुरक्षित की जा सकती हैं।

🟠ग्राहक भी स्थानीय कलाकारों के समर्थन की कर रहे अपील

ग्राहक नीलिमा चौबे का कहना हैं,कि स्थानीय मूर्तिकार वर्षों से मेहनत कर मूर्तियां तैयार करते हैं। ऐसे कलाकारों को प्रोत्साहन देने के लिए लोगों को स्थानीय स्तर पर बनी मूर्तियों को प्राथमिकता देनी चाहिए।त्योहार खत्म होने में भले ही कुछ ही दिन बाकी हों, लेकिन सचिंद्रनाथ मंडल की तैयार मूर्तियां अब भी खरीदारों की राह देख रही हैं। उनके लिए यह सिर्फ मूर्तियों की बिक्री नहीं, बल्कि पांच दशकों से चली आ रही कला और परिवार की उम्मीदों को बचाए रखने की जद्दोजहद हैं।

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