न्यूज डेस्क,अंबिकापुर,छत्तीसगढ़,13अक्टूबर2026
छत्तीसगढ़ में वन्यजीव संरक्षण की एक प्रेरणादायक कहानी सामने आई हैं। अंबिकापुर में रेस्क्यू किए गए एक भारतीय अजगर के मुंह में गंभीर गांठ होने के कारण उसकी जान पर खतरा मंडरा रहा था। हालत ऐसी थी,कि उसके लिए सामान्य रूप से भोजन निगलना भी मुश्किल हो गया था। ऐसे में सरगुजा के ‘स्नेकमैन’ सत्यम द्विवेदी ने, उसकी तकलीफ को पहचाना और बेहतर इलाज के लिए करीब 250 किलोमीटर का सफर तय कर उसे बिलासपुर पहुंचाया। यहां विशेषज्ञ चिकित्सकों की टीम ने करीब साढ़े तीन घंटे तक सर्जरी कर उसके मुंह के भीतर मौजूद गांठ को निकाल दिया।करीब 8.5 किलोग्राम वजनी इस अजगर का मामला वन्यजीवों के रेस्क्यू के साथ-साथ उनके बेहतर उपचार की जरूरत को भी सामने लाता हैं। फिलहाल ऑपरेशन के बाद अजगर को चिकित्सकीय निगरानी में रखा गया हैं। उसकी स्थिति में सुधार और पूरी तरह स्वस्थ होने की उम्मीद के बीच विशेषज्ञ उसकी रिकवरी पर नजर बनाए हुए हैं।
🟠विश्वकर्मा मंदिर के पीछे मिला था बीमार अजगर
जानकारी के मुताबिक, करीब एक सप्ताह पहले अंबिकापुर के विश्वकर्मा मंदिर के पीछे एक भारतीय अजगर को रेस्क्यू किया गया था। उसके मुंह में असामान्य सूजन दिखाई दे रही थी। शुरुआत में आशंका जताई गई कि शायद उसने कोई बड़ा शिकार निगल लिया हैं,जिसके कारण मुंह के आसपास सूजन आ गई होगी।लेकिन जब सरगुजा में सांपों के रेस्क्यू के लिए सक्रिय सत्यम द्विवेदी ने उसकी स्थिति को बारीकी से देखा, तो उन्हें मुंह के भीतर असामान्य गांठ नजर आई। इससे यह आशंका मजबूत हुई कि अजगर की परेशानी सामान्य सूजन से कहीं अधिक गंभीर हो सकती हैं।मुंह में गांठ होने के कारण उसके लिए भोजन निगलना मुश्किल हो रहा था। वन्यजीवों में ऐसी स्थिति लंबे समय तक बनी रहने पर उनके स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ सकता हैं। स्थिति की गंभीरता को समझते हुए सत्यम ने उसके उपचार के लिए विशेषज्ञों की मदद लेने का निर्णय किया।
🟠वन विभाग से अनुमति लेकर 250 किलोमीटर का सफर
अजगर की हालत को देखते हुए,सत्यम द्विवेदी ने सरगुजा वन विभाग से संपर्क किया और आवश्यक अनुमति प्राप्त की। इसके बाद उसे बेहतर उपचार के लिए बिलासपुर ले जाने की व्यवस्था की गई।करीब 250 किलोमीटर की यह यात्रा अजगर को विशेषज्ञ चिकित्सा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से की गई। किसी बीमार वन्यजीव को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाना केवल परिवहन का मामला नहीं होता, बल्कि इस दौरान उसकी स्थिति और सुरक्षित रखरखाव का भी ध्यान रखना पड़ता हैं।सत्यम की पहल से अजगर को ऐसे विशेषज्ञों तक पहुंचाने का रास्ता बना, जहां उसकी जांच और सर्जरी की जा सके। इस पूरे प्रयास में वन विभाग से समन्वय और समय पर चिकित्सा सहायता जुटाना अहम रहा।
🟠डॉ. पीके चंदन ने जांच के बाद किया रेफर
बिलासपुर पहुंचने पर अजगर की जांच कानन पेंडारी के उप संचालक एवं वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ. पीके चंदन ने की। मुंह में मौजूद गांठ की गंभीरता को देखते हुए उसे आगे के उपचार के लिए पेट मेडिक्स के संचालक डॉ. पीयूष दुबे के पास रेफर किया गया।इसके बाद अजगर की स्थिति को ध्यान में रखते हुए सर्जरी की तैयारी की गई। उपचार का उद्देश्य मुंह के भीतर मौजूद गांठ को निकालना और उसकी परेशानी कम करना था, ताकि आगे चलकर वह सामान्य रूप से भोजन कर सके।विशेषज्ञों के सामने चुनौती गांठ को निकालने के साथ-साथ ऑपरेशन के दौरान और उसके बाद अजगर की स्थिति को स्थिर बनाए रखने की भी थी। इसलिए पूरी प्रक्रिया सावधानीपूर्वक की गई।
🟠साढ़े तीन घंटे चला ऑपरेशन, मुंह से निकाली गई गांठ
डॉ. पीयूष दुबे और उनकी टीम ने आधुनिक चिकित्सा उपकरणों की मदद से अजगर की सर्जरी की। करीब साढ़े तीन घंटे तक चले इस जटिल ऑपरेशन में उसके मुंह के भीतर मौजूद गांठ को सफलतापूर्वक निकाल दिया गया।उपलब्ध जानकारी के अनुसार, गांठ काफी बड़ी थी और उसके कारण अजगर को भोजन करने में परेशानी हो रही थी। सर्जरी के बाद उसे ड्रिप और आवश्यक चिकित्सकीय सहायता दी गई, ताकि उसकी स्थिति पर लगातार नजर रखी जा सके।ऑपरेशन सफल होने के बाद भी अजगर की पूरी रिकवरी के लिए आगे की देखभाल महत्वपूर्ण हैं। घाव भरने, संक्रमण से बचाव और सामान्य रूप से भोजन करने की क्षमता में सुधार जैसे पहलुओं पर विशेषज्ञों को ध्यान देना होगा।ध्यान देने वाली बात यह हैं,कि गांठ को निकालने की सफलता और अजगर का पूरी तरह स्वस्थ हो जाना दो अलग-अलग चरण हैं। उसकी वास्तविक रिकवरी के बारे में चिकित्सकीय निगरानी और आगे की जांच के आधार पर ही स्थिति स्पष्ट होगी।
🟠ICU और वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखकर हो रही देखभाल
सर्जरी के बाद अजगर को बेहतर स्वास्थ्य लाभ देने के लिए ICU सपोर्ट, वेंटिलेटर और अन्य आधुनिक चिकित्सा उपकरणों की सहायता लिए जाने की जानकारी सामने आई हैं। चिकित्सकीय टीम उसकी स्थिति पर लगातार नजर रख रही हैं।सरीसृपों का उपचार विशेष सावधानी की मांग करता हैं। उनकी शारीरिक संरचना, श्वसन प्रक्रिया, शरीर के तापमान और भोजन करने की क्षमता को ध्यान में रखते हुए देखभाल करनी पड़ती हैं। सर्जरी के बाद यह निगरानी और भी महत्वपूर्ण हो जाती हैं।फिलहाल अजगर की सेहत में आगे कितना सुधार होता हैं, यह उसकी रिकवरी और चिकित्सकों के आकलन पर निर्भर करेगा। इसलिए उसके स्वस्थ होने या प्राकृतिक परिवेश में छोड़े जाने को लेकर अंतिम स्थिति की जानकारी विशेषज्ञों और वन विभाग के निर्णय के बाद ही स्पष्ट होगी।
🟠‘स्नेकमैन ऑफ सरगुजा’ सत्यम द्विवेदी की पहल बनी उम्मीद
इस पूरे बचाव अभियान में सत्यम द्विवेदी की भूमिका महत्वपूर्ण रही। सरगुजा क्षेत्र में सांपों और अन्य वन्यजीवों के रेस्क्यू के लिए सक्रिय सत्यम को लोग ‘स्नेकमैन ऑफ सरगुजा’ के नाम से जानते हैं।इस मामले में उन्होंने अजगर को रेस्क्यू करने के बाद उसकी स्थिति को समझा, वन विभाग से संपर्क किया और बेहतर उपचार के लिए उसे बिलासपुर पहुंचाने में पहल की। जानकारी के मुताबिक, वह फिलहाल बिलासपुर में रहकर अजगर की देखभाल में भी सहयोग कर रहे हैं।यह पहल बताती हैं,कि वन्यजीव संरक्षण केवल सांप या दूसरे जीव को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने तक सीमित नहीं हैं। घायल या बीमार वन्यजीव की परेशानी पहचानना,जरूरत के अनुसार विशेषज्ञों तक पहुंचाना और उसके उपचार में सहयोग देना भी इस प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
🟠क्या अजगर को दोबारा जंगल में छोड़ा जाएगा
अजगर के मुंह से गांठ निकालने के बाद अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल उसकी पूरी रिकवरी का हैं। उसे प्राकृतिक परिवेश में छोड़ने से पहले यह सुनिश्चित करना जरूरी होगा कि वह पर्याप्त रूप से स्वस्थ हैं,और सामान्य गतिविधियां कर सकता हैं।इसके लिए विशेषज्ञों की सलाह, उसकी चिकित्सकीय स्थिति और वन विभाग की निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार निर्णय लिया जाएगा। जब तक उसकी सेहत को लेकर पूरी तरह संतोषजनक स्थिति नहीं बनती, तब तक निगरानी और उपचार महत्वपूर्ण रहेंगे।इस मामले में गांठ को निकालने की सर्जरी एक अहम कदम हैं। हालांकि, गांठ के कैंसरयुक्त होने या इसे सरीसृपों में कैंसर के सर्जिकल उपचार का पहला मामला बताने के दावे की पुष्टि के लिए चिकित्सकीय रिपोर्ट और स्वतंत्र प्रमाण जरूरी हैं।
🟠वन्यजीव संरक्षण के लिए क्या हैं,इस घटना का संदेश
अंबिकापुर से बिलासपुर तक एक बीमार अजगर को उपचार दिलाने की यह कोशिश वन्यजीवों के प्रति संवेदनशीलता और समय पर चिकित्सा सहायता की अहमियत को सामने लाती हैं। अक्सर सांपों को देखकर लोग डर जाते हैं,लेकिन वे भी प्राकृतिक पारिस्थितिकी का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और घायल या बीमार होने पर उचित देखभाल के हकदार हैं।सत्यम द्विवेदी की पहल और विशेषज्ञ चिकित्सकों के प्रयास से अजगर को उपचार का अवसर मिला हैं। अब सभी की नजर उसकी रिकवरी पर हैं। उम्मीद हैं,कि चिकित्सकीय देखरेख में उसकी स्थिति में सुधार होगा और विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार उसके लिए आगे की सुरक्षित व्यवस्था की जाएगी।












