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“पापा, मैं ठीक हो जाऊंगी ना?” – मासूम शांभवी को सरकार ने दिया नया जीवन

संदिली सिंह,रायपुर,2सितंबर2025/विशेष रिपोर्ट-Nexis Newsबीजापुर जिले के भोपालपटनम ब्लॉक के छोटे से गांव वरदली में रहने वाली 11 वर्षीय शांभवी गुरला की मासूमियत ने, हर किसी का दिल छू लिया। सातवीं कक्षा की होनहार छात्रा शांभवी पिछले कुछ महीनों से गंभीर रियूमेटिक हार्ट डिजीज (RHD) से पीड़ित हैं।बीमारी की वजह से उसका बचपन रुक-सा गया था।दोस्तों की तरह खेलना-कूदना अब उसके लिए सपना बन गया था।

उसकी मासूम आंखों में हर दिन सिर्फ एक ही सवाल तैरता था—

“पापा, मैं ठीक हो जाऊंगी ना?”लेकिन आर्थिक तंगी और महंगे इलाज की चिंता में डूबे उसके पिता इस सवाल का जवाब नहीं दे पाते थे।

🟠परिवार की चिंता और टूटती उम्मीदें

🔸️खेती-किसानी कर जैसे-तैसे परिवार का गुजारा चल रहा था।डॉक्टरों ने जब बताया,कि शांभवी का इलाज रायपुर में होगा और इसमें काफी खर्च आएगा, तो परिवार की उम्मीदें टूटने लगीं।

🔸️घर में रोज चर्चा होती—“अब क्या होगा? हमारी बेटी का इलाज कैसे होगा?”

🔸️मां अक्सर रोते-रोते बेटी को सीने से लगाकर कहती— “बेटा, सब ठीक होगा।” लेकिन पिता की आंखों में चिंता और बेबसी साफ दिखाई देती थी।

🟠मंत्री से मुलाकात बनी नई शुरुआत

आखिरकार, परिवार ने हिम्मत जुटाई और बेटी को लेकर, सीधे स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल के पास पहुंचे।मंत्री जी ने बच्ची को देखा और उसकी मासूमियत ने उन्हें भावुक कर दिया। उन्होंने तुरंत रायपुर के एडवांस कार्डियक इंस्टिट्यूट (ACI) के डॉक्टर स्मित श्रीवास्तव से बात की, और आदेश दिया,कि शांभवी का इलाज बिना देरी के शुरू किया जाए।

मंत्री ने परिवार को भरोसा दिलाया— “आपको इलाज के खर्च की चिंता करने की जरूरत नहीं हैं। सरकार पूरी जिम्मेदारी लेगी। शांभवी को पूरा इलाज मिलेगा और वह जल्द ठीक होगी।”

🟠आंसुओं से मुस्कान तक का सफर

स्वास्थ्य मंत्री की यह बात सुनकर शांभवी की मां की आंखों से,राहत के आंसू बह निकले। कांपती आवाज़ में उन्होंने कहा—

“मंत्री जी, आप हमारी बेटी को नया जीवन दे रहे हैं। हमारे लिए आप किसी डॉक्टर से कम नहीं।”

सरकार की पहल पर शांभवी को रायपुर लाया गया और एडवांस कार्डियक इंस्टिट्यूट में डॉक्टरों की टीम ने,उसका इलाज शुरू कर दिया हैं। जांच रिपोर्ट आने के बाद शल्यक्रिया और आगे की चिकित्सा तय की जाएगी।

🟠उम्मीद से भरी नई मुस्कान

इलाज शुरू होने के बाद अब परिवार के चेहरे पर,चिंता की जगह उम्मीद ने ले ली हैं। आज शांभवी फिर मुस्कुराकर अपने पिता से पूछती हैं—

“पापा, मैं जल्दी खेल पाऊंगी ना?”

और इस बार पिता की आंखों में आंसू नहीं, बल्कि उम्मीद और खुशी की चमक हैं।

🟠पूरे प्रदेश के लिए भरोसे का संदेश

यह सिर्फ एक बच्ची की कहानी नहीं हैं, बल्कि यह सरकार के उस संकल्प का उदाहरण हैं,जिसमें हर गरीब परिवार को यह भरोसा दिया गया हैं,कि उनकी संतानों के इलाज के लिए सरकार हमेशा साथ खड़ी हैं।

शांभवी की मुस्कान अब उन हजारों परिवारों के लिए उम्मीद का प्रतीक हैं,जो स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और आर्थिक तंगी से जूझते हैं।

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