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दशहरा : बुराई पर विजय का पर्व या बदलती संवेदनाओं का आईना?

संदिली सिंह,रायपुर/छत्तीसगढ़,2अक्टूबर2025,विशेष रिपोर्ट-Nexis News

राम-रावण की गाथा हम सबने सुनी है। हर साल दशहरे पर रावण का पुतला जलता है, पटाखों की गूंज से आसमान रोशन होता है और लोग यह संदेश लेकर घर लौटते हैं कि “सत्य की जीत होती हैं”।

लेकिन क्या आज दशहरा सिर्फ परंपरा भर रह गया हैं, या इसमें नई पीढ़ी के लिए कोई नई सीख भी छिपी हैं?

🟠इस बार रावण कौन हैं?

आज समाज में रावण केवल पुतलों तक सीमित नहीं। भ्रष्टाचार, नशा, फर्जी खबरें, सामाजिक विभाजन – ये सब हमारे सामने नए-नए रावण के रूप में खड़े हैं। असली विजय तो तब होगी जब हम इन आधुनिक रावणों का दहन करेंगे।

🟠हरियाली वाला दशहरा

कई शहरों में अब “ग्रीन दशहरा” की शुरुआत हुई हैं – जहाँ पटाखों के धुएं की जगह पर्यावरण-मित्र आयोजन किए जाते हैं। कागज़, प्लास्टिक और जहरीले रंगों से बने पुतलों के बजाय इको-फ्रेंडली सामग्री से रावण बनाए जा रहे हैं।

🟠डिजिटल युग का संदेश

सोशल मीडिया पर इस बार #मेरा_रावण_कौन हैशटैग ट्रेंड कर रहा हैं, जहाँ लोग अपने जीवन की बुरी आदतों को “रावण” मानकर उनसे छुटकारा पाने की शपथ ले रहे हैं। कोई आलस्य को जला रहा हैं, कोई नकारात्मक सोच को, तो कोई सोशल मीडिया की लत को।

🟠पर्व का असली सार

दशहरा केवल त्योहार नहीं, बल्कि यह याद दिलाने का अवसर हैं,कि हम सभी के भीतर एक “राम” और एक “रावण” हैं। विजय उसी की होगी जो सही राह चुनेगा।

🟠निष्कर्ष

इस दशहरे की असली जीत पुतलों को जलाने से नहीं, बल्कि अपनी सोच और आदतों के भीतर छिपे “रावण” को हराने से होगी। यही विजयादशमी का नया अर्थ हैं – आत्मविजय ही असली विजय हैं।

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