न्यूज डेस्क,सुंदरगढ़,उड़ीसा,17जुलाई 2026
भगवान श्री जगन्नाथ की रथयात्रा का नाम आते ही, सबसे पहले पुरी की भव्य परंपरा याद आती हैं,लेकिन ओडिशा का आदिवासी बहुल सुंदरगढ़ जिला भी अपनी अनोखी रथयात्रा परंपरा के लिए विशेष पहचान रखता हैं। यहां महाप्रभु की रथयात्रा केवल एक दिन का आयोजन नहीं, बल्कि लगातार 18 दिनों तक चलने वाला आस्था, संस्कृति और सामाजिक एकता का महापर्व हैं। शहर से लेकर गांव तक अलग-अलग दिनों में निकलने वाली रथयात्रा पूरे जिले को भक्ति के रंग में रंग देती हैं।
🟠9 दिनों तक अलग-अलग स्थानों पर निकलती हैं,रथयात्रा
सुंदरगढ़ में रथयात्रा की सबसे बड़ी विशेषता यह हैं,कि यहां एक ही दिन नहीं, बल्कि लगातार नौ दिनों तक अलग-अलग क्षेत्रों में भगवान श्री जगन्नाथ, बलभद्र, देवी सुभद्रा और श्री सुदर्शन की रथयात्रा निकाली जाती हैं।पहले दिन सुंदरगढ़ शहर के राजबाटी स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर से रथयात्रा शुरू होती हैं। दूसरे दिन महेशडीही, तीसरे दिन शंकरा और चौथे दिन टांगरपाली ब्लॉक के नुआपाड़ा सहित अन्य गांवों में क्रमवार रथयात्रा आयोजित होती हैं। इसी तरह नौ दिनों तक महाप्रभु का रथ अलग-अलग स्थानों पर भक्तों के बीच पहुंचता हैं।
🟠फिर 9 दिनों तक होती हैं,बाहुड़ा यात्रा
रथयात्रा के नौ दिन बाद बाहुड़ा यात्रा शुरू होती हैं। जिस क्रम में महाप्रभु मौसी मां के मंदिर जाते हैं,उसी क्रम में नौ दिनों तक उनकी वापसी यात्रा भी निकाली जाती हैं। इस तरह सुंदरगढ़ में रथयात्रा और बाहुड़ा मिलाकर कुल 18 दिनों तक धार्मिक उत्सव चलता हैं।
🟠राजाओं की परंपरा आज भी हैं,जीवंत
मान्यता हैं,कि तत्कालीन गांगपुर महाराजा ने पुरी की विश्वप्रसिद्ध रथयात्रा से प्रेरित होकर सुंदरगढ़ में श्री जगन्नाथ मंदिर का निर्माण कराया और यहां रथयात्रा की शुरुआत की। बाद में विभिन्न गांवों के जमींदारों और गौंतिया ने भी अपने-अपने क्षेत्रों में जगन्नाथ मंदिर स्थापित किए। राजा द्वारा प्रत्येक स्थान पर छेरा पहंरा की परंपरा निभाने के लिए अलग-अलग दिनों में रथयात्रा आयोजित की जाने लगी, जो आज भी पूरी श्रद्धा और परंपरा के साथ निभाई जा रही हैं।
🟠आस्था के साथ सामाजिक एकता का भी पर्व
रथयात्रा के दौरान हजारों श्रद्धालु महाप्रभु के रथ की रस्सी खींचते हैं। यहां न जाति का भेद दिखाई देता हैं, न वर्ग का अंतर। हर व्यक्ति स्वयं को महाप्रभु का सेवक मानकर रथ खींचता हैं। यही कारण हैं,कि सुंदरगढ़ की रथयात्रा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता, भाईचारे और लोक संस्कृति का जीवंत प्रतीक बन चुकी हैं।
🟠सुंदरगढ़ की पहचान बन चुकी हैं,यह परंपरा
आज सुंदरगढ़ की यह अनूठी परंपरा जिले की सांस्कृतिक पहचान बन चुकी हैं। 18 दिनों तक चलने वाले इस महापर्व में न केवल स्थानीय श्रद्धालु, बल्कि आसपास के जिलों और अन्य राज्यों से भी बड़ी संख्या में भक्त शामिल होते हैं। महाप्रभु की भक्ति, लोक परंपराएं और जनसहभागिता मिलकर इस आयोजन को ओडिशा की सबसे विशिष्ट रथयात्राओं में शामिल करती हैं।












