बसंत खेस्स,जशपुर,छत्तीसगढ़,9जून 2026
जशपुरनगर जब देश आजादी की लड़ाई लड़ रहा था, जब जशपुर की गलियों में बिजली तक नहीं पहुंची थी और जब स्कूलों में आधुनिक सुविधाओं की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी, तब एक झोलपंखा बच्चों और शिक्षकों को राहत की ठंडी हवा देता था। हैरानी की बात यह हैं,कि 1937 में लगाया गया वही झोलपंखा आज भी जशपुर के बालक उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के प्राचार्य कक्ष में पूरी शान से टंगा हुआ हैं।
करीब 88 साल पुराना यह झोलपंखा केवल एक पंखा नहीं, बल्कि शिक्षा, अनुशासन, सादगी और इतिहास का जीवंत साक्षी हैं। इसने अंग्रेजी शासन, आजादी, मध्यप्रदेश का दौर, छत्तीसगढ़ राज्य का गठन और अब डिजिटल युग तक का सफर देखा हैं।
🟠जब रस्सी खींचने से मिलती थी ठंडी हवा
12 दिसंबर 1934 को स्थापित इस विद्यालय में वर्ष 1937 में यह झोलपंखा लगाया गया था। उस समय बिजली नहीं थी, इसलिए इसे रस्सियों के सहारे हाथ से चलाया जाता था। चटाईनुमा इस पंखे की धीमी गति कमरे में ठंडक और सुकून भर देती थी।
🟠88 साल बाद भी नहीं बदली इसकी पहचान
स्कूल की इमारत बदली, फर्नीचर बदले, पीढ़ियां बदलीं, लेकिन यह झोलपंखा आज भी उसी स्थान पर मौजूद हैं। लकड़ी का ढांचा, चटाई की बनावट और हाथ से सिले किनारे आज भी उस दौर की कहानी बयां करते हैं।विद्यालय में आने वाले पुराने छात्र और शिक्षक इस पंखे को देखकर भावुक हो जाते हैं। उनके लिए यह सिर्फ एक वस्तु नहीं, बल्कि बचपन और शिक्षा के स्वर्णिम दिनों की याद हैं।
🟠”इस पंखे ने हमें सिर्फ हवा नहीं, संस्कार भी दिए”
सेवानिवृत्त शिक्षक शिवनाथ पाठक बताते हैं,कि यह झोलपंखा शिक्षा की उस संस्कृति का प्रतीक हैं,जहां संसाधन कम थे लेकिन ज्ञान और अनुशासन की कोई कमी नहीं थी। इसी पंखे की छांव में हजारों विद्यार्थियों ने पढ़ाई की और जीवन के मूल्य सीखे।
🟠अब बनेगा विरासत स्मारक
विद्यालय की प्राचार्य आर. डुंगडुंग के अनुसार इस ऐतिहासिक झोलपंखे को संरक्षित विरासत के रूप में विकसित किया जाएगा। इसके इतिहास को दर्शाने वाली जानकारी पट्टिका भी लगाई जाएगी ताकि आने वाली पीढ़ियां शिक्षा के इस अनमोल इतिहास को जान सकें।
🟠विरासत की ठंडी छांव
आज जब एसी और आधुनिक तकनीक का दौर है, तब भी जशपुर का यह झोलपंखा लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रहा हैं। यह हमें याद दिलाता हैं,कि इतिहास केवल किताबों में नहीं, बल्कि उन वस्तुओं में भी जीवित रहता हैं,जो समय के साथ अपनी कहानी कहती रहती हैं।
🟠88 साल से छत पर टंगा यह झोलपंखा मानो आज भी कह रहा हैं—
“मैं सिर्फ हवा नहीं देता था, मैं उस दौर की शिक्षा, सादगी, अनुशासन और आत्मसम्मान का प्रतीक था… और आज भी हूं।”












