ब्यूरो सरगुजा,बलरामपुर,छत्तीसगढ़,8सितंबर2026
पड़ताल व विशेष टेक्निकल ग्राउंड रिपोर्ट: ब्यूरो सरगुजा
सैकड़ों करोड़ रुपये का राष्ट्रीय राजमार्ग, केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी परियोजना और प्रशासनिक दावों की लंबी फेहरिस्त कागजों पर विकास चमक रहा हैं, लेकिन धरातल पर यह मार्ग सीधे ‘मौत का कुआं’ साबित हो रहा हैं। छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर-रामानुजगंज राष्ट्रीय राजमार्ग (NH-343) पर जो मंजर दिखाई दे रहा हैं, वह किसी प्राकृतिक आपदा या अत्यधिक बारिश का परिणाम नहीं, बल्कि सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) के तकनीकी दिशा-निर्देशों की खुली अवहेलना और भ्रष्टाचार की जीती-जागती तस्वीर हैं।
ग्राउंड जीरो से सामने आए वीडियो और विजुअल साक्ष्य साफ बयां कर रहे हैं,कि किस तरह 3 से 4 फीट गहरे कीचड़ के दलदल में यात्री बसें और 16-चक्का भारी ट्रक धंस कर फंसे हुए हैं। पहिए दलदल में समा चुके हैं,एंबुलेंस का रास्ता बंद हैं,और जनता लाचार खड़ी हैं। वहीं दूसरी ओर, निर्माण एजेंसी के जिम्मेदार अफसर कैमरे के सामने बेशर्मी से रटा-रटाया बहाना दोहरा रहे हैं—”अत्यधिक बारिश की वजह से सड़क खराब हुई हैं।”लेकिन MoRTH की आधिकारिक इंजीनियरिंग गाइडलाइंस और जमीनी हकीकत का यह ‘तकनीकी ऑडिट’ अफसरों के इस खोखले बहाने के परखच्चे उड़ाने के लिए काफी हैं।
🟠MoRTH के नियमों की धज्जियां: ‘बारिश’ बहाना, असल वजह तकनीकी चोरी
सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) के विनिर्देशों के अनुसार, मानसून से पहले मिट्टी के काम और सब-ग्रेड तैयार करने के बेहद सख्त और अनिवार्य नियम हैं, जिन्हें इस हाईवे पर पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया:
🔸️सेक्शन 305.3.5 (अनिवार्य कंपैक्शन और रोलिंग का नियम): MoRTH की स्पष्ट गाइडलाइन हैं,कि जब भी सड़क पर मिट्टी की परत बिछाई जाती हैं,तो उसे खुला या ढीला नहीं छोड़ा जा सकता। मिट्टी बिछाने के तत्काल बाद भारी रोलर (वाइब्रेटरी रोलर्स) चलाकर उसकी ऑप्टिमम मॉइस्चर कंटेंट (OMC) पर कुटाई (Compaction) करना अनिवार्य हैं। नियम के मुताबिक, मिट्टी की परत को कम से कम 95% से 97% मैक्सिमम ड्राई डेंसिटी (MDD) तक कंप्रेस किया जाना चाहिए, ताकि उसमें पानी रिसने की जगह ही न बचे। NH-343 पर मिट्टी डालकर रोलिंग कराई ही नहीं गई; ढीली और असंगठित मिट्टी पर बारिश पड़ते ही वह दलदल में तब्दील हो गई।
🔸️सेक्शन 301 और 305 (प्री-मॉनसून प्रोटेक्शन व ड्रेनेज): मंत्रालय का नियम कहता हैं,कि मानसून आने से पहले किसी भी निर्माणाधीन सड़क पर पानी निकासी के लिए अनिवार्य कैम्बर दिया जाना चाहिए, ताकि बारिश की एक बूंद भी सड़क की सतह पर न रुके और तुरंत किनारे की नालियों में बह जाए। NH-343 पर न तो कोई साइड ड्रेन (नाली) बनाई गई और न ही ढलान दी गई। नतीजा यह हुआ कि बारिश का पानी सड़क पर जमा होकर तालाब बन गया।
🔸️सेक्शन 305.2 (चिकनी मिट्टी पर पूर्ण प्रतिबंध): विनिर्देशों के अनुसार, हाइवे निर्माण में उच्च प्लास्टिसिटी इंडेक्स (PI) वाली अत्यधिक चिकनी या काली मिट्टी का उपयोग पूरी तरह वर्जित हैं। ठेकेदारों ने बजरी और मुरम के पैसे बचाने के लिए पास की खदानों से मुफ्त में मिलने वाली चिकनी मिट्टी पाट दी। चिकनी मिट्टी की फितरत होती हैं,कि पानी मिलते ही उसकी भार वहन क्षमता (CBR वैल्यू) शून्य हो जाती हैं,जिससे 40-50 टन के भारी वाहन सीधे जमीन में धंस जाते हैं।
🟠करोड़ों का खेल : पैकेज-1 और पैकेज-3 की फाइलें सवालों के घेरे में
सैकड़ों करोड़ रुपये के इस प्रोजेक्ट में कागजों पर तो उच्च तकनीकी काम दर्ज किए जा रहे हैं, लेकिन धरातल पर खेल कुछ और ही चल रहा हैं:
🔸️पैकेज-1 (राजपुरी खुर्द से पाढ़ी खंड – 49 किमी): इस हिस्से के लिए 397.44 करोड़ रुपये की लागत स्वीकृत हैं,जिसमें से लगभग 240.14 करोड़ रुपये का कार्य अवार्ड किया गया। कागजों में यहां विश्वस्तरीय GSB और सब-ग्रेड का काम होना था, लेकिन मौके पर गिट्टी का एक दाना नहीं दिखता, सिर्फ घुटनों तक दलदल पसरा है।
🔸️पैकेज-3 (बड़की महरी से रामानुजगंज खंड – 29.43 किमी): लगभग 30 किलोमीटर के इस टुकड़े के लिए करीब 200 करोड़ रुपये (199.50 करोड़) का भारी-भरकम बजट आवंटित हैं। यहां भारी वाहनों के पहिए 3-3 फीट जमीन में समा चुके हैं और आवागमन पूरी तरह ठप हो चुका हैं।
🟠ग्राउंड जीरो पर तबाही: ‘पेटीदारी’ सिस्टम ने छीनी जनता की सांसें
वीडियो फुटेज में साफ देखा जा सकता हैं,कि मुख्य निर्माण कंपनियों ने मलाईदार कमीशन अपनी जेब में रखकर पूरा काम स्थानीय ‘पेटी कॉन्ट्रैक्टर्स’ (पेटीदारों) के हवाले कर दिया हैं। इन पेटीदारों के पास न तो मिट्टी की डेंसिटी जांचने वाली लैब हैं,न पर्याप्त रोलर हैं और न ही कोई तकनीकी विशेषज्ञता।
🟠इसका खामियाजा आम जनता, बस संचालक और मरीज भुगत रहे हैं:
🔸️तीन-तीन फीट गहरे गड्ढों में जलभराव के चलते यात्री बसें कभी भी पलटने की स्थिति में आ जाती हैं।
🔸️बलरामपुर और रामानुजगंज का जिला मुख्यालय से सड़क संपर्क लगभग कट चुका हैं।
🔸️गंभीर मरीजों को लेकर जाने वाली 108 एंबुलेंस इस दलदल में फंस रही हैं। राजधानी रायपुर या जिला अस्पताल पहुंचने के रास्ते बंद होने के कारण मरीजों को लाचारी में पड़ोसी राज्य झारखंड ले जाना पड़ रहा हैं।
🟠वो सुलगते सवाल, जिन पर NHAI और प्रशासन को घुटने टेकने पड़ेंगे
प्रोजेक्ट मैनेजर अखिलेश विश्वकर्मा भले ही ‘अत्यधिक बारिश’ का बहाना बनाकर अपना पल्ला झाड़ लें, लेकिन तकनीकी हकीकत के सामने यह दलील टिक नहीं सकती। अब शासन-प्रशासन और एनएचएआई के शीर्ष अफसरों को इन सीधे सवालों का जवाब देना होगा:
रोलिंग और कंपैक्शन टेस्ट कहां है? MoRTH सेक्शन 305 के तहत बारिश से पहले डाली गई मिट्टी का ‘फील्ड ड्राई डेंसिटी’ (FDD) टेस्ट रजिस्टर कहां है? क्या रोलिंग का 97% कंपैक्शन सर्टिफिकेट मौजूद है, या सिर्फ कागजों पर फर्जी साइन किए गए?
🔸️चिकनी मिट्टी की अनुमति किसने दी? जब MoRTH के तहत क्ले-सॉइल प्रतिबंधित हैं, तो हाईवे पर खदान की चिकनी मिट्टी डलवाने की अनुमति किस सक्षम अधिकारी या कंसल्टेंट ने दी?
🔸️इंडिपेंडेंट इंजीनियर (IE) और क्वालिटी अफसरों पर केस कब? करोड़ों रुपये की कंसल्टेंसी फीस लेने वाले इंडिपेंडेंट इंजीनियर और क्वालिटी कंट्रोलर ने बिना GSB और बिना रोलिंग के निर्माण एजेंसी के रनिंग बिलों पर हस्ताक्षर कैसे कर दिए?
🔸️सैकड़ों करोड़ का बजट किसके खातों में गया? जब सड़क पर गिट्टी-मुरम नहीं हैं,तो क्या सैकड़ों करोड़ की राशि जनता को इसी जानलेवा दलदल में धकेलने के लिए स्वीकृत की गई थी?
NH-343 की बदहाली अब कोई सामान्य समस्या नहीं, बल्कि खुलेआम किया गया ‘मानव-निर्मित अपराध’ हैं। यदि केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय और राज्य शासन ने,तत्काल इस पूरे प्रोजेक्ट का स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट नहीं कराया और दोषी अफसरों व ठेकेदारों पर आपराधिक एफआईआर दर्ज नहीं की, तो जनता की अदालत में इस लूट का हिसाब तय होना तय हैं।












