कबाड़ की ई-रिक्शा बनी गौमाता की सेवा का सहारा,रामानुजगंज के युवा हर शनिवार घर-घर से जुटाते हैं रोटियां, 250 परिवार जुड़े नेक पहल से

अर्पित तिवारी,बलरामपुर,छत्तीसगढ़,11अक्टूबर2026

सेवा करने के लिए बड़े संसाधनों की नहीं,बल्कि सच्चे मन और मजबूत इच्छाशक्ति की जरूरत होती हैं। छत्तीसगढ़ के रामानुजगंज में कुछ युवाओं ने,इस बात को अपने काम से साबित करने की कोशिश की हैं। शहर की सड़कों पर भूखी और बेसहारा घूमने वाली गायों की परेशानी देखकर छत्तीसगढ़ हेल्प वेलफेयर सोसाइटी और ‘भारत माता की रसोई’ से जुड़े युवाओं ने गौसेवा का अनूठा अभियान शुरू किया हैं। हर शनिवार ये युवा ई-रिक्शा लेकर घर-घर पहुंचते हैं, परिवारों से रोटियां एकत्र करते हैं और रात में सड़कों पर घूमने वाली गायों को खिलाते हैं। कभी महज 10 घरों से शुरू हुई इस पहल से आज 250 से अधिक परिवार जुड़ चुके हैं।

🟠कबाड़ में पड़ी ई-रिक्शा को बनाया गौसेवा का साथी

इस अभियान की कहानी भी अपने आप में खास हैं। युवाओं के पास एक खराब ई-रिक्शा थी,जो लंबे समय से कबाड़ की तरह पड़ी हुई थी। टीम ने उसे बेकार छोड़ने के बजाय मरम्मत कराकर दोबारा चलने लायक बनाया। अब यही ई-रिक्शा गौसेवा के इस अभियान का महत्वपूर्ण साधन बन गई हैं।युवा इसी ई-रिक्शा के जरिए शहर के अलग-अलग इलाकों में पहुंचते हैं और घरों से गायों के लिए रोटियां एकत्र करते हैं। उनकी यह पहल बताती हैं,कि उपलब्ध संसाधनों का सही इस्तेमाल करके भी समाज के लिए उपयोगी काम किया जा सकता हैं।

🟠10 घरों से शुरुआत, अब 250 से ज्यादा परिवारों का साथ

शुरुआत में इस अभियान से केवल 10 परिवार जुड़े थे। धीरे-धीरे लोगों को युवाओं के प्रयास की जानकारी मिली और सहयोग करने वाले परिवारों की संख्या बढ़ती गई। आज 250 से अधिक परिवार इस पहल में अपनी भागीदारी निभा रहे हैं।अभियान के तहत हर शनिवार को, युवा घर-घर जाकर प्रत्येक सहयोगी परिवार से दो-दो रोटियां एकत्र करते हैं। इसके बाद रात के समय इन रोटियों को सड़कों पर बेसहारा घूमने वाली गायों को खिलाया जाता हैं।इस पहल की खासियत यह हैं,कि इसमें आम नागरिक भी सीधे जुड़ सकते हैं। परिवारों की ओर से दिया गया छोटा-सा सहयोग मिलकर गौसेवा के एक सामूहिक प्रयास का रूप ले रहा हैं।

बाइट 01: युवा कार्यकर्ता, छत्तीसगढ़ हेल्प वेलफेयर सोसाइटी

 

🟠सिर्फ रोटियां नहीं, गौशालाओं तक सेवा पहुंचाने का भी लक्ष्य

युवाओं का कहना हैं,कि वे इस अभियान को आगे और व्यापक रूप देना चाहते हैं। उनकी योजना भविष्य में गौशालाओं तक भी सेवा पहुंचाने की हैं। इसके तहत गायों के लिए हरी सब्जियां और भूसा उपलब्ध कराने का प्रयास किया जाएगा।यदि स्थानीय नागरिकों और समाजसेवी लोगों का सहयोग बढ़ता हैं, तो इस पहल को और आगे ले जाने की संभावनाएं बन सकती हैं। युवाओं की कोशिश हैं, कि पशुओं के प्रति संवेदनशीलता केवल किसी एक दिन तक सीमित न रहे, बल्कि समाज में नियमित सेवा की भावना विकसित हो।

🟠स्थानीय लोगों ने की पहल की सराहना, पशुपालकों से भी अपील

रामानुजगंज में युवाओं के इस प्रयास की स्थानीय नागरिक सराहना कर रहे हैं। उनका मानना हैं,कि बेसहारा पशुओं को भोजन उपलब्ध कराना मानवीय संवेदनशीलता और सामाजिक जिम्मेदारी से जुड़ा काम हैं। ऐसे प्रयासों में अधिक से अधिक लोगों को अपनी क्षमता के अनुसार सहयोग करना चाहिए।इसके साथ ही नागरिकों ने पशुपालकों से अपील की है कि वे अपनी गायों को सड़कों पर लावारिस न छोड़ें। खासकर ठंड के मौसम में पशुओं को सुरक्षित स्थान पर रखना और उनके भोजन-पानी की उचित व्यवस्था करना जरूरी हैं। गौसेवा के साथ पशुओं की जिम्मेदारी निभाना भी उतना ही महत्वपूर्ण हैं।

🟠युवाओं की पहल ने दिया सेवा और जिम्मेदारी का संदेश

रामानुजगंज के इन युवाओं का अभियान समाज को यह संदेश देता हैं,कि किसी अच्छे काम की शुरुआत छोटी हो सकती हैं, लेकिन लोगों का साथ मिलने पर उसका दायरा लगातार बढ़ सकता हैं। खराब ई-रिक्शा को दोबारा उपयोग में लाकर गौसेवा से जोड़ना और 10 परिवारों से शुरू हुए प्रयास को 250 से अधिक परिवारों तक पहुंचाना इसी सामूहिक भावना का उदाहरण हैं।जहां एक ओर युवा रात में बेसहारा गायों तक भोजन पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर स्थानीय परिवार भी इस अभियान में सहयोग देकर अपनी भागीदारी निभा रहे हैं।रामानुजगंज की यह पहल बताती हैं,कि सेवा का असली महत्व दिखावे में नहीं, बल्कि उन छोटे-छोटे प्रयासों में हैं, जो जरूरतमंद जीवों के जीवन में राहत पहुंचाने का काम करते हैं।

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