संदिली सिंह,रायपुर,छत्तीसगढ़,15अक्टूबर2026
छत्तीसगढ़ अपनी प्राकृतिक सुंदरता, समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और धार्मिक परंपराओं के लिए विशेष पहचान रखता हैं। यहां के प्राचीन मंदिर,ऐतिहासिक स्थल, घने जंगल, पहाड़ और नदियां पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। प्रदेश में धार्मिक पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं। इन्हीं संभावनाओं को विस्तार देने और प्रमुख देवी मंदिरों को बेहतर पर्यटन सुविधाओं से जोड़ने के उद्देश्य से राज्य सरकार ने शक्तिपीठ परियोजना की पहल की हैं।उत्तराखंड के चारधाम की तर्ज पर विकसित किए जाने वाले इस, धार्मिक पर्यटन कॉरिडोर के अंतर्गत प्रदेश के पांच प्रमुख शक्तिपीठों को एक सर्किट के रूप में विकसित करने की योजना हैं। इसके माध्यम से श्रद्धालुओं को एक ही यात्रा में विभिन्न देवी धामों के दर्शन करने का अवसर उपलब्ध कराने के साथ इन स्थलों पर आधारभूत सुविधाओं का विस्तार करने पर जोर दिया जा रहा हैं।शक्तिपीठ परियोजना का उद्देश्य केवल मंदिरों तक पहुंच आसान बनाना नहीं, बल्कि धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक विरासत, स्थानीय अर्थव्यवस्था और पर्यटन को एक साथ आगे बढ़ाना भी हैं। बेहतर सड़क संपर्क, स्वच्छता, प्रकाश व्यवस्था, पेयजल, पार्किंग, विश्राम स्थल और सुरक्षा जैसी सुविधाएं विकसित होने से श्रद्धालुओं की यात्रा अधिक सुविधाजनक हो सकती हैं।
🟠पांच प्रमुख शक्तिपीठों को जोड़ने की योजना
छत्तीसगढ़ आस्था पथ यानी शक्तिपीठ भ्रमण योजना के तहत पांच प्रमुख देवी मंदिरों को धार्मिक पर्यटन सर्किट के रूप में विकसित करने की पहल की गई हैं। इनमें शामिल हैं—
🔸️मां बम्लेश्वरी मंदिर, डोंगरगढ़ — राजनांदगांव जिला
🔸️मां महामाया मंदिर, रतनपुर — बिलासपुर जिला
🔸️मां दंतेश्वरी मंदिर, दंतेवाड़ा — बस्तर संभाग
🔸️मां बागेश्वरी मंदिर, कुदरगढ़ — सूरजपुर जिला
🔸️मां चंद्रहासिनी मंदिर, चंद्रपुर — सक्ती जिला
ये पांचों धार्मिक स्थल अपनी अलग-अलग ऐतिहासिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पहचान रखते हैं। नवरात्रि सहित विभिन्न धार्मिक अवसरों पर यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। शक्तिपीठ सर्किट के माध्यम से इन मंदिरों के बीच पर्यटन संपर्क मजबूत करने और यात्रियों को आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराने की दिशा में काम किए जाने की परिकल्पना हैं।राज्य सरकार ने वित्तीय वर्ष 2026-27 के बजट में छत्तीसगढ़ आस्था पथ योजना के लिए ₹5 करोड़ का प्रावधान किया हैं। इस पहल से प्रदेश में धार्मिक पर्यटन को व्यवस्थित रूप से बढ़ावा देने की उम्मीद हैं।
🟠मां बम्लेश्वरी मंदिर, डोंगरगढ़: पहाड़ी पर विराजमान आस्था का केंद्र
राजनांदगांव जिले के डोंगरगढ़ में स्थित मां बम्लेश्वरी मंदिर छत्तीसगढ़ के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल हैं। पहाड़ी पर स्थित यह मंदिर प्राकृतिक सुंदरता और आध्यात्मिक वातावरण के लिए प्रसिद्ध हैं। यहां वर्षभर श्रद्धालुओं का आगमन होता हैं,जबकि चैत्र और शारदीय नवरात्रि के दौरान विशेष धार्मिक उत्साह देखने को मिलता हैं।मां बम्लेश्वरी को देवी शक्ति के स्वरूप के रूप में पूजा जाता हैं। मंदिर से जुड़ी प्रचलित मान्यताओं के अनुसार, प्राचीन काल में इस क्षेत्र को कामाख्या नगरी के नाम से जाना जाता था। राजा वीरसेन की आराधना और देवी की कृपा से पुत्र प्राप्ति की कथा भी स्थानीय धार्मिक परंपराओं में प्रचलित हैं। मंदिर के इतिहास को प्राचीन काल से जोड़कर देखा जाता हैं, हालांकि इसकी स्थापना और विभिन्न निर्माण चरणों से संबंधित विवरणों में अलग-अलग मान्यताएं मिलती हैं।डोंगरगढ़ में श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या को देखते हुए सड़क संपर्क, पार्किंग, प्रकाश व्यवस्था, स्वच्छता, पेयजल और विश्राम सुविधाओं का महत्व बढ़ जाता हैं। शक्तिपीठ परियोजना के अंतर्गत ऐसी सुविधाओं के विकास से तीर्थयात्रियों को लाभ मिल सकता हैं। पहाड़ी क्षेत्र की प्राकृतिक सुंदरता और स्थानीय सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखते हुए पर्यटन सुविधाओं का विस्तार करना भी आवश्यक होगा।
🟠मां महामाया मंदिर,रतनपुर : कलचुरी इतिहास की अनमोल धरोहर
बिलासपुर जिले के रतनपुर में स्थित मां महामाया मंदिर छत्तीसगढ़ के प्राचीन और प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों में से एक हैं। रतनपुर का ऐतिहासिक महत्व कलचुरी शासन से जुड़ा हुआ हैं। मंदिर को लेकर प्रचलित ऐतिहासिक विवरणों में इसका निर्माण 11वीं-12वीं शताब्दी के आसपास बताया जाता हैं। इसे राजा रत्नदेव प्रथम और कलचुरी राजवंश की धार्मिक परंपराओं से जोड़ा जाता हैं।मां महामाया मंदिर में देवी के प्रति श्रद्धालुओं की गहरी आस्था हैं। नवरात्रि के दौरान यहां विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक गतिविधियां आयोजित होती हैं। मंदिर की स्थापत्य परंपरा, धार्मिक मान्यताएं और रतनपुर का ऐतिहासिक परिवेश इसे पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाते हैं।केंद्र सरकार की तीर्थस्थल पुनरुत्थान एवं आध्यात्मिक विरासत संवर्धन अभियान यानी प्रसाद (PRASHAD) योजना के अंतर्गत मां महामाया मंदिर, रतनपुर के समग्र विकास के लिए लगभग ₹200 करोड़ की कार्ययोजना तैयार कर केंद्रीय पर्यटन मंत्रालय को भेजे जाने का उल्लेख किया गया हैं। प्रस्ताव को स्वीकृति मिलने और आवश्यक प्रक्रियाएं पूरी होने के बाद ही इसके क्रियान्वयन की स्थिति स्पष्ट होगी।रतनपुर मंदिर के विकास से संबंधित योजना में श्रद्धालुओं के लिए सुविधाओं का विस्तार,परिसर का सौंदर्यीकरण और पर्यटन आधारभूत संरचना को बेहतर बनाने जैसे पहलुओं पर ध्यान दिया जा सकता हैं। मंदिर के ऐतिहासिक स्वरूप को सुरक्षित रखते हुए विकास कार्य करना भी महत्वपूर्ण होगा।
🟠मां दंतेश्वरी मंदिर, दंतेवाड़ा: बस्तर की आस्था और परंपरा का प्रतीक
बस्तर संभाग के दंतेवाड़ा में स्थित मां दंतेश्वरी मंदिर प्रदेश के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल हैं। यह मंदिर धार्मिक आस्था के साथ बस्तर की जनजातीय परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान से भी गहराई से जुड़ा हुआ हैं। शंखिनी और डंकिनी नदियों के संगम क्षेत्र के निकट स्थित इस मंदिर का विशेष महत्व माना जाता हैं।धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह स्थल देवी सती से जुड़ी शक्तिपीठ परंपरा का हिस्सा हैं। मां दंतेश्वरी को बस्तर क्षेत्र की आराध्य देवी माना जाता हैं। स्थानीय इतिहास में मंदिर का संबंध काकतीय राजवंश और बस्तर की राजपरंपराओं से भी जोड़ा जाता हैं।विश्वप्रसिद्ध बस्तर दशहरा के दौरान मां दंतेश्वरी की आराधना और उनसे जुड़ी धार्मिक परंपराओं का विशेष महत्व रहता हैं। इस अवसर पर दूर-दूर से श्रद्धालु और जनजातीय समुदायों के लोग धार्मिक आयोजनों में भाग लेते हैं। यह आयोजन बस्तर की सांस्कृतिक विविधता, सामुदायिक सहभागिता और परंपराओं को प्रदर्शित करता हैं।मंदिर क्षेत्र में बेहतर सड़क संपर्क, स्वच्छता, पेयजल, यात्री सहायता केंद्र, पार्किंग और सुरक्षा सुविधाओं का विकास श्रद्धालुओं के लिए उपयोगी हो सकता हैं। साथ ही स्थानीय जनजातीय संस्कृति और परंपराओं का सम्मान करते हुए पर्यटन गतिविधियों को आगे बढ़ाना आवश्यक हैं।
🟠मां बागेश्वरी मंदिर, कुदरगढ़: पहाड़ों और जंगलों के बीच श्रद्धा का धाम
सूरजपुर जिले के ओड़गी विकासखंड में स्थित कुदरगढ़ धाम मां बागेश्वरी की आराधना के लिए प्रसिद्ध हैं। पहाड़ी पर स्थित यह मंदिर प्राकृतिक वातावरण और धार्मिक मान्यताओं के कारण श्रद्धालुओं को आकर्षित करता हैं। चारों ओर जंगलों और पहाड़ी भूभाग से घिरे इस स्थल तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को चढ़ाई भी करनी पड़ती हैं।स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, कुदरगढ़ क्षेत्र मां भगवती की तपोस्थली रहा हैं। यहां देवी की शक्ति और राक्षसों के संहार से जुड़ी कथाएं प्रचलित हैं। मंदिर की देखरेख और पूजा-पद्धति में स्थानीय समुदायों की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही हैं। बैगा समुदाय से जुड़ी धार्मिक परंपराएं इस स्थल की सांस्कृतिक विशिष्टता को दर्शाती हैं।कुदरगढ़ जैसे पहाड़ी धार्मिक स्थलों पर पर्यटन विकास के दौरान पर्यावरण संरक्षण का विशेष ध्यान रखना जरूरी हैं। श्रद्धालुओं के लिए सुरक्षित चढ़ाई मार्ग, रेलिंग, पेयजल, विश्राम स्थल, प्रकाश व्यवस्था, प्राथमिक चिकित्सा और स्वच्छता सुविधाएं उपयोगी हो सकती हैं।इसके साथ ही जंगलों, प्राकृतिक जल स्रोतों और स्थानीय जैव विविधता को सुरक्षित रखते हुए,विकास कार्य किए जाने चाहिए, ताकि धार्मिक पर्यटन के विस्तार से पर्यावरण पर अनावश्यक दबाव न पड़े।
🟠मां चंद्रहासिनी मंदिर, चंद्रपुर: महानदी तट पर श्रद्धालुओं का प्रमुख धाम
सक्ती जिले के चंद्रपुर में महानदी के तट के निकट स्थित मां चंद्रहासिनी मंदिर प्रदेश के प्रसिद्ध देवी मंदिरों में से एक हैं। यह स्थल धार्मिक आस्था और प्राकृतिक परिवेश के कारण विशेष महत्व रखता हैं। यहां वर्षभर श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं,और नवरात्रि के अवसर पर धार्मिक गतिविधियां बढ़ जाती हैं।मंदिर से जुड़ी स्थानीय मान्यताओं में संबलपुर के राजा चंद्रहास और देवी चंद्रहासिनी की कथाएं प्रचलित हैं। मंदिर के इतिहास और जीर्णोद्धार से संबंधित विवरण स्थानीय धार्मिक परंपराओं में मिलते हैं। महानदी के निकट स्थित होने के कारण यह स्थल धार्मिक पर्यटन के साथ नदी और प्राकृतिक परिवेश के संरक्षण की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हैं।मंदिर परिसर में सुव्यवस्थित पार्किंग, स्वच्छ पेयजल, सामुदायिक शौचालय, प्रकाश व्यवस्था, श्रद्धालुओं के बैठने की जगह और सुरक्षा प्रबंधन जैसी सुविधाएं विकसित होने से यात्रियों को सुविधा मिल सकती हैं। नदी के आसपास स्वच्छता बनाए रखना और जल स्रोतों को प्रदूषण से बचाना भी जरूरी होगा।
🟠पांचों शक्तिपीठों में विकसित होंगी आधुनिक यात्री सुविधाएं
शक्तिपीठ परियोजना का एक प्रमुख उद्देश्य श्रद्धालुओं को बेहतर और सुविधाजनक धार्मिक यात्रा का अनुभव उपलब्ध कराना हैं। इसके अंतर्गत विभिन्न स्थलों की जरूरतों और भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार सुविधाओं के विकास पर जोर दिया जा सकता हैं।
🟠प्रस्तावित सुविधाओं में शामिल हैं—
🔸️बेहतर सड़क संपर्क और सुरक्षित पहुंच मार्ग
🔸️स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था
🔸️आधुनिक शौचालय और स्वच्छता प्रबंधन
🔸️सुव्यवस्थित पार्किंग स्थल
🔸️पर्याप्त प्रकाश व्यवस्था
🔸️श्रद्धालुओं के लिए बैठने और विश्राम करने की जगह
🔸️हवन एवं पूजन के लिए व्यवस्थित स्थल
🔸️रेलिंग और सुरक्षित पैदल मार्ग
🔸️सीसीटीवी कैमरे और सुरक्षा व्यवस्था
🔸️प्राथमिक चिकित्सा सुविधा
🔸️पर्यटक सहायता केंद्र और डिजिटल सूचना प्रणाली
🔸️स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप ठहरने की सुविधाएं और होमस्टे
🔸️उपयुक्त स्थलों पर पर्यटन सूचना एवं मार्गदर्शन केंद्र
रोप-वे जैसी सुविधाओं का विकास संबंधित स्थल की भौगोलिक स्थिति, तकनीकी व्यवहार्यता, पर्यावरणीय प्रभाव और आवश्यक स्वीकृतियों के आकलन के बाद ही किया जा सकता हैं। सभी सुविधाओं का उद्देश्य श्रद्धालुओं की सुरक्षा, सुविधा और धार्मिक अनुभव को बेहतर बनाना होना चाहिए।
🟠प्रसाद योजना से धार्मिक पर्यटन को मिलेगा विस्तार
केंद्र सरकार की प्रसाद योजना का उद्देश्य चयनित तीर्थस्थलों पर पर्यटन संबंधी आधारभूत सुविधाओं का विकास करना हैं। इसके माध्यम से धार्मिक स्थलों की यात्रा को अधिक सुविधाजनक बनाने, पर्यटकों के अनुभव में सुधार करने और स्थानीय अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करने पर ध्यान दिया जाता हैं।छत्तीसगढ़ के प्रमुख देवी मंदिरों के विकास के लिए केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजे जाने की जानकारी दी गई हैं। मां महामाया मंदिर, रतनपुर के लिए लगभग ₹200 करोड़ की कार्ययोजना का उल्लेख किया गया हैं,जबकि डोंगरगढ़, कुदरगढ़, चंद्रपुर और दंतेवाड़ा के शक्तिपीठों के लिए विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन (CPR) तैयार करने की प्रक्रिया का उल्लेख हैं।इन प्रस्तावों की स्वीकृति, वित्तीय मंजूरी और क्रियान्वयन की स्थिति संबंधित विभागों की आगे की कार्रवाई पर निर्भर करेगी। परियोजनाओं को मंजूरी मिलने के बाद ही कार्यों की समयसीमा और विकास के वास्तविक स्वरूप के बारे में स्पष्ट जानकारी उपलब्ध होगी।
🟠धार्मिक पर्यटन से बढ़ेंगे रोजगार और स्थानीय व्यवसाय के अवसर
पर्यटन किसी भी क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता हैं। धार्मिक स्थलों पर श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ने से स्थानीय दुकानदारों, होटल संचालकों, वाहन चालकों, भोजनालयों, हस्तशिल्प से जुड़े लोगों और अन्य सेवा प्रदाताओं को रोजगार के अवसर मिल सकते हैं।शक्तिपीठ सर्किट विकसित होने से पांचों धार्मिक स्थलों के आसपास पर्यटन संबंधी गतिविधियों को प्रोत्साहन मिलने की संभावना हैं। स्थानीय युवाओं को पर्यटन मार्गदर्शन, आतिथ्य सेवाओं, परिवहन, होमस्टे और स्थानीय उत्पादों के विपणन जैसे क्षेत्रों में अवसर मिल सकते हैं।हालांकि, इसके लिए केवल आधारभूत संरचना विकसित करना पर्याप्त नहीं होगा। पर्यटन सेवाओं की गुणवत्ता, स्थानीय लोगों का प्रशिक्षण, स्वच्छता, पर्यटकों की सुरक्षा और स्थानीय संस्कृति का संरक्षण भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा।
🟠स्थानीय संस्कृति और पर्यावरण का संरक्षण भी जरूरी
छत्तीसगढ़ की धार्मिक विरासत में मंदिरों के साथ स्थानीय लोक परंपराओं, जनजातीय संस्कृति, स्थापत्य कला और प्राकृतिक परिवेश की महत्वपूर्ण भूमिका हैं। इसलिए शक्तिपीठों का विकास करते समय उनकी मूल पहचान को सुरक्षित रखना आवश्यक होगा।कुदरगढ़ के जंगलों, दंतेवाड़ा की जनजातीय परंपराओं, रतनपुर की ऐतिहासिक धरोहर और महानदी के तट पर स्थित चंद्रपुर जैसे स्थलों पर विकास की योजना स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप बनाई जानी चाहिए।पर्यटन गतिविधियों से उत्पन्न कचरे का उचित प्रबंधन, जल स्रोतों की स्वच्छता, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण और स्थानीय समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित करना दीर्घकालिक विकास के लिए जरूरी हैं। इससे पर्यटन का लाभ स्थानीय लोगों तक पहुंचाने के साथ धार्मिक स्थलों की विशिष्टता भी बरकरार रखी जा सकती हैं।
🟠छत्तीसगढ़ की धार्मिक पहचान को मिलेगी नई दिशा
छत्तीसगढ़ की शक्तिपीठ परियोजना प्रदेश के धार्मिक पर्यटन को व्यवस्थित रूप से विकसित करने की दिशा में, एक महत्वपूर्ण पहल हैं। मां बम्लेश्वरी, मां महामाया, मां दंतेश्वरी, मां बागेश्वरी और मां चंद्रहासिनी जैसे प्रमुख देवी धामों को बेहतर सुविधाओं से जोड़ने की योजना से, श्रद्धालुओं की यात्रा को सुविधाजनक बनाने और इन स्थलों की पहचान को व्यापक स्तर पर पहुंचाने की संभावना हैं।वित्तीय वर्ष 2026-27 में छत्तीसगढ़ आस्था पथ योजना के लिए ₹5 करोड़ का बजट प्रावधान इस दिशा में राज्य सरकार की पहल को रेखांकित करता हैं। वहीं, प्रसाद योजना के तहत प्रस्तावित विकास कार्यों की स्वीकृति और क्रियान्वयन आगे की प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।यदि योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू किया जाता हैं,स्थानीय समुदायों को साथ लिया जाता है और पर्यावरण तथा सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण को प्राथमिकता दी जाती हैं,तो शक्तिपीठ सर्किट छत्तीसगढ़ के धार्मिक पर्यटन को नई पहचान देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता हैं।शक्तिपीठ परियोजना का वास्तविक महत्व तभी सामने आएगा, जब आस्था के इन केंद्रों पर श्रद्धालुओं को बेहतर सुविधाएं मिलें, स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ें और प्रदेश की धार्मिक, सांस्कृतिक तथा प्राकृतिक विरासत आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रहे।












