संदिली सिंह,रायपुर,13सितंबर2025,विशेष रिपोर्ट-Nexis News
भारतीय संस्कृति में मां और संतान का रिश्ता सबसे पवित्र और अटूट माना गया हैं। इस रिश्ते की गहराई और त्याग को व्यक्त करने वाला पर्व हैं जितिया व्रत। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को पड़ने वाला यह व्रत इस बार रविवार, 14 सितंबर 2025 को मनाया जाएगा।
इस दिन माताएं अपने पुत्र की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और जीवन में सुख-समृद्धि की कामना करते हुए निर्जला उपवास करती हैं। यह व्रत केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मातृत्व का महान तप और संतान के लिए मां की त्यागपूर्ण ममता का प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।
🟠जितिया पर्व 2025 का शुभ मुहूर्त
🔸अष्टमी तिथि प्रारंभ: 13 सितंबर (शनिवार) रात 08:12 बजे
🔸अष्टमी तिथि समाप्त: 14 सितंबर (रविवार) शाम 06:45 बजे
🔸पूजन व्रत का श्रेष्ठ समय: 14 सितंबर (रविवार) सूर्योदय से संध्या तक
🔸व्रत पारण (नवमी): 15 सितंबर (सोमवार) प्रातःकाल, स्नान-पूजन के बाद
🟠धार्मिक महत्व
जितिया व्रत की कथा राजकुमार जीमूतवाहन से जुड़ी है। उन्होंने नागवंश को विनाश से बचाने के लिए अपने प्राणों का बलिदान दे दिया था। उनके इस असाधारण त्याग से प्रसन्न होकर देवताओं ने आशीर्वाद दिया कि इस दिन जो माताएं निर्जला उपवास करेंगी, उनके पुत्र सदा दीर्घायु और निरोग रहेंगे। इसी कारण इस पर्व को “मां और संतान के अटूट रिश्ते का पर्व” कहा जाता हैं।
🟠व्रत की परंपरा और नियम
🔸भरखुटिया (तैयारी): अष्टमी से एक दिन पहले यानी सप्तमी को महिलाएं विशेष भोजन करती हैं जिसे ‘भरखुटिया’ कहा जाता हैं।
🔸निर्जला उपवास: अष्टमी के दिन महिलाएं पूरे दिन अन्न-जल का त्याग कर उपवास करती हैं। कथा श्रवण: उपवास के दौरान जितिया कथा सुनना अनिवार्य है। कथा में जीमूतवाहन की वीरता और त्याग का वर्णन होता हैं।
🔸जन-कीर्तन: महिलाएं सामूहिक रूप से लोकगीत और भक्ति-गीत गाती हैं।
🔸पूजा-पाठ: नदी या तालाब में स्नान कर पारंपरिक पूजा की जाती हैं।
🔸पारण: नवमी तिथि पर व्रत का पारण कर प्रसाद और पूजन सामग्री का वितरण किया जाता हैं।
🟠जितिया व्रत की कथा (संक्षेप में)
कथा के अनुसार, जीमूतवाहन एक धर्मपरायण राजकुमार थे। उन्होंने देखा कि हर दिन नागवंश का एक सदस्य गरुड़ को भक्ष्य के रूप में दिया जाता था। नागवंश की रक्षा के लिए उन्होंने स्वयं गरुड़ को अपना शरीर समर्पित कर दिया। उनकी निःस्वार्थ भावना और त्याग से प्रसन्न होकर देवताओं ने आशीर्वाद दिया कि उनकी स्मृति में माताएं उपवास करेंगी तो उनके पुत्र दीर्घायु होंगे। तभी से जितिया व्रत का प्रचलन शुरू हुआ।
🟠सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व
मातृत्व का पर्व: यह त्यौहार मां के त्याग, प्रेम और आशीर्वाद का प्रतीक है। सामाजिक एकता: गांव-गांव में महिलाएं सामूहिक कथा, पूजा और गीत-कीर्तन करती हैं, जिससे सामाजिक एकजुटता बढ़ती हैं। संस्कृति का संवाहक: लोकगीतों और पारंपरिक नृत्य के माध्यम से यह पर्व आने वाली पीढ़ियों को हमारी समृद्ध संस्कृति और परंपराओं से जोड़ता है। नारी शक्ति का प्रदर्शन: यह व्रत माताओं की शक्ति, धैर्य और त्याग की अभिव्यक्ति हैं।
🟠निष्कर्ष
जितिया पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मातृत्व की शक्ति और त्याग का प्रत्यक्ष प्रतीक हैं। मां का यह व्रत संतान के जीवन में सुरक्षा, स्वास्थ्य और लंबी आयु का संकल्प हैं। यही कारण है कि सदियों से यह पर्व आस्था, परंपरा और संस्कृति का अमूल्य धरोहर बनकर समाज में जीवित हैं।












