जिला प्रशासन के कड़े नियमों के बावजूद सरगुजा की सड़कों पर आज भी आवारा मवेशियों का ‘राज’, अस्पतालों और चौक-चौराहों पर रातभर पसरा रहता है मवेशियों का डेरा – कागज़ पर कानून सख्त, जमीनी हकीकत ढीली

न्यूज डेस्क,स्पेशल रिपोर्ट,रायपुर/छत्तीसगढ़/29सितंबर2025—Nexis News

सरगुजा जिला प्रशासन ने भी पूरी गंभीरता से कहा था कि अब कोई भी पशुपालक अपने जानवरों को सड़कों पर खुला छोड़ेगा तो उसे कड़ी सज़ा और जुर्माने का सामना करना पड़ेगा। भारतीय दंड संहिता 2023 की धारा 285 और 291 तथा पशु क्रूरता अधिनियम 1960 के तहत कार्रवाई की चेतावनी दी गई थी।
उस समय लगा कि अब सड़कों पर बेफिक्र घूमते मवेशियों का आतंक खत्म होगा, हादसे कम होंगे और यातायात सुचारू रहेगा। लेकिन हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है।

🟠तस्वीरें बयां कर रही हैं सच्चाई

🔸ताज़ा हालात यह हैं कि अस्पतालों, क्लीनिकों और मुख्य चौक-चौराहों पर रात होते ही आवारा पशुओं का डेरा जम जाता है।
🔸कहीं अस्पताल के सामने गाय-बैल चैन की नींद सोते नज़र आते हैं।
🔸कहीं मुख्य मार्गों पर यह बीच सड़क बैठकर गाड़ियों को अचानक ब्रेक लगाने पर मजबूर करते हैं।
🔸कभी-कभी तो ट्रक, बाइक और कारें इनके बीच से किसी तरह निकलती हैं और टक्कर से बचती हैं।
🔸यह नज़ारा देखकर ऐसा लगता है जैसे प्रशासन ने वास्तव में इन्हें ‘सड़क राजा’ घोषित कर दिया हो।

🟠आदेश बनाम हकीकत

कागज़ पर आदेश साफ कहते हैं –
👉 आवारा पशु सड़क पर मिले तो मालिक को दंडित किया जाएगा।
👉 पशुपालक अपने मवेशियों को सुरक्षित स्थान पर रखें।
👉 समितियां बनाई गई हैं जो निगरानी करेंगी।

लेकिन ज़मीन पर हालात कह रहे हैं –
👉 सड़कें अब भी पशुओं के आरामगाह बनी हुई हैं।
👉 यात्री और वाहन चालक हर पल हादसों के डर में सफर कर रहे हैं।
👉 समितियां बनीं तो सही, पर वे शायद मवेशियों के साथ ही आराम कर रही हैं।

🟠जनता का व्यंग्य

स्थानीय लोग तंज कसते हुए कह रहे हैं –

“आदेश तो इतने सख्त हैं कि पढ़कर ही डर लगे, लेकिन सड़क पर निकलो तो लगे कि मवेशियों ने ही आदेश जारी किया है कि अब सड़कें उन्हीं की हैं।”

“लगता है प्रशासन ने अस्पतालों के सामने आवारा मवेशियों को ‘रात्री विश्राम स्थल’ घोषित कर दिया है।”

“जुर्माना और सज़ा की बातें सिर्फ कागज़ और प्रेस विज्ञप्ति तक ही सीमित हैं, धरातल पर असर नदारद है।”

🟠हादसों का खतरा बरकरार

सड़क पर बैठे या घूमते मवेशियों से हर दिन हादसों का खतरा मंडराता है। कई बार दुपहिया सवार अचानक सामने आए मवेशी से टकराकर घायल हो चुके हैं। रात के अंधेरे में तो यह खतरा और बढ़ जाता है।

सवाल यह है कि जब नियम बने हुए हैं, तो फिर उनका पालन क्यों नहीं हो रहा? क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतज़ार कर रहा है?

🟠निष्कर्ष

सरगुजा सहित प्रदेश के कई जिलों में आवारा मवेशियों की समस्या कोई नई नहीं है। प्रशासन समय-समय पर आदेश तो जारी करता है, लेकिन उनका असर ज़मीन पर दिखाई नहीं देता। जनता चाहती है कि अब सिर्फ आदेश और चेतावनी नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई हो।

आवारा पशुओं को सुरक्षित गौशालाओं में रखा जाए, मालिकों पर कड़ी कार्रवाई की जाए और यातायात व्यवस्था को सुरक्षित बनाया जाए। वरना आदेश चाहे जितने सख्त हों, आवारा मवेशियों का राज सड़कों पर वैसे ही चलता रहेगा।

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