न्यूज डेस्क,गोवा/नई दिल्ली,8अक्टूबर2026
भारतीय सिनेमा के सबसे प्रभावशाली,संजीदा और बेबाक अभिनेताओं में शुमार नाना पाटेकर (विश्वनाथ पाटेकर) का,75 वर्ष की उम्र में गोवा स्थित आवास पर कार्डियक अरेस्ट (दिल का दौरा पड़ने) के कारण निधन हो गया। पर्दे पर अपनी आग उगलती संवाद अदायगी और असल जिंदगी में सादगी व समाजसेवा की मिसाल रहे नाना पाटेकर के जाने से कला और सामाजिक जगत में एक अपूरणीय शून्य पैदा हो गया हैं।कला के इस अप्रतिम पुरोधा और किसानों के मसीहा के महाप्रयाण पर Nexis News परिवार उन्हें शत-शत नमन करते हुए,अपनी विनम्र व भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हैं।
🟠संवाद अदायगी के बेताज बादशाह : जिसने अभिनय को नया तेवर दिया
1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के मुरुड-जंजीरा में जन्मे नाना पाटेकर ने मुंबई के प्रसिद्ध ‘सर जे. जे. इंस्टीट्यूट ऑफ अप्लाइड आर्ट’ से तालीम हासिल की। रंगमंच (थिएटर) के कड़े अनुशासन से तपकर निकले नाना ने 1978 में फिल्म गमन से बड़े पर्दे पर दस्तक दी। इसके बाद उन्होंने अभिनय की जो लकीर खींची, उसे छू पाना किसी भी कलाकार के लिए आज भी एक सपना हैं।नाना पाटेकर संवादों को सिर्फ बोलते नहीं थे, बल्कि उन्हें अपनी रूह और तीखे तेवरों से दर्शकों के सीने में उतार देते थे।
🔸️क्रांतिवीर (1994): “ये मुसलमान का खून, ये हिंदू का खून… बता इसमें कौन सा मुसलमान का, कौन सा हिंदू का?” — व्यवस्था, सांप्रदायिकता और भ्रष्टाचार पर प्रहार करते इस किरदार ने पूरे देश को झकझोर दिया था। इसके लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला।
🔸️परिंदा (1989): ‘अन्ना सेठ’ के खौफनाक, जटिल और मानसिक द्वंद्व से भरे किरदार ने हिंदी सिनेमा में खलनायकी की परिभाषा बदल दी, जिसने उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार दिलाया।
🔸️अग्निसाक्षी (1996): एक जुनूनी, सनकी पति के किरदार में उनकी आंखों की आक्रामकता और भावुकता ने दर्शकों को स्तब्ध कर दिया था।
🔸️खामोशी: The Musical (1996): जहां डायलॉग्स उनकी ताकत थे, वहीं इस फिल्म में एक मूक-बधिर पिता बनकर उन्होंने साबित किया कि खामोशी से भी अभिनय के शिखर छुए जा सकते हैं।
🔸️वेलकम (2007): डॉन ‘उदय शेट्टी’ बनकर नाना ने जिस सहजता से दर्शकों को हंसाया, उसने दिखाया कि गंभीर छवि का यह अभिनेता कॉमेडी में भी बेजोड़ है।
🔸️नटसम्राट (2016): मराठी सिनेमा की इस कालजयी फिल्म में ‘गणपत रामचंद्र बेलवलकर’ के रूप में उनका दर्द, लाचारी और अभिनय का तूफान भारतीय सिनेमा के स्वर्णिम इतिहास में हमेशा अमर रहेगा।
🟠पर्दे पर कठोर,असल जिंदगी में किसानों और जवानों के मसीहा
नाना पाटेकर उन गिने-चुने कलाकारों में थे,जो चमक-दमक भरी फिल्मी दुनिया में रहकर भी जमीन से जुड़े रहे। उनका एक पैर हमेशा आम जनता के बीच रहा।जब महाराष्ट्र के मराठवाड़ा और विदर्भ के किसान सूखे और कर्ज से टूटकर आत्महत्या कर रहे थे, तब नाना पाटेकर केवल बयानों तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर ‘नाम फाउंडेशन’ (Naam Foundation) की नींव रखी।उन्होंने घर-घर जाकर पीड़ित किसान परिवारों की माताओं-बहनों के आंसू पोंछे और उन्हें आर्थिक संबल दिया।गांवों में जल संरक्षण और नदी गहरीकरण के बड़े अभियानों को जन-आंदोलन का रूप दिया।1999 के कारगिल युद्ध के दौरान वे खुद जवानों का हौसला बढ़ाने सीमा पर पहुंचे थे और सेना के लिए भी लगातार सहयोग करते रहे।
🟠जनसरोकारों की मुखर आवाज को Nexis News का नमन
नाना पाटेकर का जाना सिर्फ एक अभिनेता का पर्दा छोड़ना नहीं हैं,यह उस निर्भीक आवाज का खामोश होना हैं,जो सत्ता और समाज के दोहरे चरित्र पर आईना तानने से कभी नहीं हिचकिचाई।
Nexis News परिवार ईश्वर से प्रार्थना करता हैं,कि दिवंगत पुण्यात्मा को अपने श्रीचरणों में मोक्ष प्रदान करें तथा उनके परिजनों, प्रशंसकों और भारतीय कला जगत को इस अपार आघात को सहन करने की शक्ति दें।
अलविदा नाना… आपकी आवाज, आपका जज्बा और आपकी विरासत हमेशा जिंदा रहेगी!












